दिल्ली – राजस्थान के डूंगरपुर में फ्लोरा फाउंडेशन और मुस्कान संस्था ने संयुक्त रूप से एक सराहनीय पहल की है। इन संस्थाओं ने जहां देवालय वहां विद्यालय अभियान के तहत फ्लोरा फाउंडेशन गुरुकुल की स्थापना की है जिसमें बच्चों को शिक्षा, संस्कारऔर आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया जाएगा।*
प. पु.जैन मुनि श्री जिन रत्नविजय जी म. सा. के पावन सानिध्य में यह कार्यक्रम फ्लोरा फाउंडेशन के ट्रस्टी और मुंबई के पूर्व उप महापौर बाबूभाई भवानजी और मुस्कान के चेयरमैन श्री भरत नागड़ा जी जैन द्वारा संचालित किया जा रहा है।
*बाबूभाई भवानजी ने बताया कि इस आश्रम शाला में छात्रों को शास्त्रों का ज्ञान, संस्कार, देशभक्ति, इंसानियत,* *स्वरोजगार, सेल्फ डिफेंस, भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्य और आत्मनिर्भरता की शिक्षा दी जाएगी।
भवानजी ने कहा कि प्रत्येक राष्ट्र की सामाजिक एवं सांस्कृतिक उन्नति वहाँ की शिक्षा पद्धति पर निर्भर करती है। हमारे देश में स्वतन्त्रता के बाद शिक्षा क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है और वर्तमान में कला, वाणिज्य, विज्ञान, चिकित्सा आदि अनेक विषयों के विभिन्न संवर्गों में शिक्षा का गुणात्मक प्रसार हो रहा है। फिर भी एक कमी यह है कि यहाँ नैतिक शिक्षा पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है। इससे युवा पीढ़ी संस्कारहीन और कोरी भौतिकतावादी बन रही है।
उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत में विद्याश्रमों में चारित्रिक उत्कर्ष के लिए नैतिक शिक्षा पर बल दिया जाता था। उस समय विद्यार्थियों में नैतिक आदर्शों को अपनाने की होड़ लगी रहती थी। लेकिन भारत सैकड़ों वर्षों तक पराधीन रहा, जिससे शिक्षा का स्वरूप चरित्र–निर्माण न होकर केवल अर्थोपार्जन रह गया। इस कारण यहाँ नैतिक शिक्षा का ह्रास हुआ। ईमानदारी, कर्त्तव्यनिष्ठा, परोपकार, समाज सेवा, उदारता, सद्भावना, मानवीय संवेदना तथा उदात्त आचरण आदि का अभाव इसी नैतिक शिक्षा के ह्रास का परिणाम माना जाता है।*
*भवानजी ने कहा कि हमारे मनीषियों ने वर्तमान शिक्षा पद्धति के गुण–दोषों का चिन्तन कर नैतिक शिक्षा के प्रसार का समर्थन किया। फलस्वरूप प्राथमिक–माध्यमिक शिक्षा–स्तर पर नैतिक शिक्षा का समायोजन किया जाने लगा है। प्राचीन नीति–शिक्षा से सम्बन्धित आख्यानों, कथाओं एवं ऐतिहासिक महापुरुषों के चरित्रों आदि को आधार बनाकर नैतिक शिक्षा की पाठ्य–सामग्री तैयार की गयी है। वस्तुतः विद्यार्थी जीवन आचरण की पाठशाला है। अत: विद्यार्थी को जैसी शिक्षा दी जायेगी, जैसे संस्कार उसे दिये जायेंगे, आगे चलकर वह वैसा ही नागरिक बनेगा। इस बात का ध्यान रखकर नैतिक शिक्षा का समायोजन किया गया है|*
*उन्होंने कहा कि नैतिक शिक्षा की उपयोगिता व्यक्ति, समाज और राष्ट्र इन सभी के लिए है। विद्यार्थी जीवन में तो नैतिक शिक्षा का विशेष महत्त्व और उपयोगिता है। नैतिक शिक्षा के द्वारा ही विद्यार्थी अपने चरित्र एवं व्यक्तित्व का सुन्दर निर्माण कर भविष्य को उज्ज्वल बना सकते हैं। देश के भावी नागरिक होने से उनसे समस्त राष्ट्र को नैतिक आचरण का लाभ मिलता है। देश में उच्च आदर्शों, श्रेष्ठ परम्पराओं एवं नैतिक मूल्यों की स्थापना भी तभी हो पाती है। अतएव उज्ज्वल जीवन–निर्माण के लिए नैतिक शिक्षा की विशेष उपयोगिता है।
उन्होंने आगे कहा कि व्यक्तित्व के उत्कर्ष का, संस्कारित जीवन तथा समस्त समाज–हित का प्रमुख साधन है। इससे भ्रष्टाचार, स्वार्थपरता, प्रमाद, लोलुपता, छल–कपट तथा असहिष्णुता आदि दोषों का निवारण होता है। मानवतावादी चेतना का विकास भी इसी से सम्भव है। जीवन का विकास उदात्त एवं उच्च आदर्शों से होता रहे, इसके लिए नैतिक शिक्षा की महती आवश्यकता है।

